सोशल मीडिया पर कमाई की अंधी दौड़

सोशल मीडिया पर कमाई की अंधी दौड़ नैतिक पतन

सोशल मीडिया पर कमाई की अंधी दौड़: नैतिक पतन और शरीयत के रास्ते

लेखक: मुहम्मद हाशिम क़ासमी बस्तवी (अध्यापक: जामिया इस्लामिया मुज़फ़्फ़रपुर, आज़मगढ़)

आज के दौर में डिजिटल मीडिया ने इंसान की ज़िंदगी के हर पहलू को अपनी चपेट में ले रखा है। इससे किसी को छुटकारा नहीं। यूट्यूब, फेसबुक और इंस्टाग्राम अब केवल आपसी बातचीत या विचारों के आदान-प्रदान के माध्यम नहीं रहे, बल्कि ये दुनिया का सबसे बड़ा और लुभावना बाज़ार बन चुके हैं। कुछ पलों की सस्ती वायरल लोकप्रियता, लाखों व्यूज़ की गिनती, व्यूज़ के चक्कर में हर सच-झूठ की रील्स और स्क्रीन पर तेज़ी से बढ़ते डॉलर्स ने एक ऐसा पागलपन पैदा कर दिया है जिसमें नैतिकता, आत्मसम्मान, सच-झूठ और सबसे बढ़कर हलाल व हराम का फ़र्क मिटता जा रहा है। आर्थिक तंगी से जल्दी निकलने और वर्चुअल दुनिया में अमीर दिखने की इस लालच ने इंसानी हया और ईमान की गैरत को दांव पर लगा दिया है।

अकबर इलाहाबादी ने इसी बाहरी चमक-दमक और अंदरूनी खोखलेपन की ओर इशारा करते हुए कहा था:

उठा कर फेंक दो बाहर गली में

 नई तहज़ीब के अंडे हैं गंदे

इलेक्शन, मेम्बरी, कौंसिल, सदारत

 बनाए खूब आज़ादी ने फंदे

मियां नज्जार भी छीले गए साथ

निहायत तेज़ हैं यूरोप के रंदे

इस पागलपन का एक कड़वा और शर्मनाक पहलू घरेलू ज़िंदगी को सरेआम बेपर्दा करना भी है। “डेली व्लॉगिंग” के आकर्षक नाम पर युवाओं ने अपने बेडरूम, किचन और परिवार के विशुद्ध निजी मामलों को दुनिया के सामने तमाशा बना दिया है। पति-पत्नी के आपसी राज़, घर की मां-बहनों के हाव-भाव और उनकी भावनाओं को चंद पैसों के लिए स्क्रीन पर दिखाया जा रहा है। इससे भी ज़्यादा दुखद स्थिति इंस्टाग्राम और फेसबुक रील्स पर मुस्लिम महिलाओं का ख़ुद को नुमाइश के तौर पर पेश करना है। पश्चिमी संस्कृति के असर में आकर ट्रेंडिंग गानों पर अदाएं दिखाना, श्रृंगार की नुमाइश करना और चुस्त व बारीक कपड़ों के ज़रिए व्यूज़ बटोरने की होड़ ने हया के किलों को ढहा दिया है। जबकि मुस्लिम औरतों के बारे में अल्लाह तआला का साफ़ फ़रमान है:

“और अपने घरों में ठहरी रहो और प्राचीन अज्ञानता (जाहिलियत) के ज़माने की तरह अपने बनाव-श्रृंगार की नुमाइश मत करो।” (अल-अहज़ाब: 33)

जब हया का पर्दा हट जाता है, तो इंसान सस्ती शोहरत की भीख मांगने के लिए किसी भी हद तक गिर जाता है। अकबर इलाहाबादी के शब्दों में:

बे-पर्दा नज़र आईं जो कल चंद बीबियां,

अकबर ज़मीं में ग़ैरते-क़ौमी से गड़ गया

पूछा जो उनसे पर्दा वो क्या था, किधर गया?

 कहने लगीं कि अक़्ल पे मर्दों की पड़ गया

दूसरी तरफ, युवा पीढ़ी क्लिकबेट (भ्रामक थंबनेल), झूठे व उत्तेजक थंबनेल्स, बेतुके और दूसरों को परेशान करने वाले प्रैंक्स, और लाइव वीडियोज़ में गाली-गलौज के ज़रिए नैतिक पतन की उस सीमा तक पहुँच चुकी है जहाँ मानवीय सभ्यता दम तोड़ चुकी है। इस वैचारिक और नैतिक दिवालियापन का ज़हरीला असर पूरे समाज की रगों में समा चुका है।

सबसे चिंताजनक स्थिति छोटे लड़कों और कम-उम्र बच्चियों की है, जिनके मासूम दिमाग़ पर इन सस्ती और अश्लील रील्स ने गहरा वार किया है। जब बच्चे हर पल स्क्रीन पर महिलाओं को चंद व्यूज़ और लाइक्स के लिए सज-धज कर नुमाइश करते और नाचते देखते हैं, तो उनके दिमाग़ में हया, पाकदामनी और पर्दे की इस्लामी सोच एक पुरानी क़ैद जैसी लगने लगती है। कम-उम्र बच्चियां पर्दे को बोझ और ख़ुद की नुमाइश को तरक़्क़ी का एकमात्र रास्ता समझने लगी हैं, जबकि लड़के अपनी नज़रों की पाकीज़गी खोकर भटकाव का शिकार हो रहे हैं।

इस स्थिति ने समाज के पूरे नैतिक ढांचे को हिला दिया है। जिस क़ौम की पहचान हया, ग़ैरत और पारिवारिक सम्मान थी, आज उसके युवाओं के सामने ठोस  ज्ञान, और हुनर और हलाल मेहनत की कोई क़द्र नहीं रह गई। कुछ सेकंड की बेहूदा हरकतों से शोहरत पाने वाले लोग नई पीढ़ी के रोल मॉडल बन चुके हैं। एकांत और खुलेपन की सीमाएं मिटने से घर की पवित्रता नष्ट हो चुकी है और दिलों से गुनाह का डर ख़त्म हो रहा है। अल्लामा इक़बाल ने इसी पश्चिमी सभ्यता की बेपर्दगी पर कहा था:

हया नहीं है ज़माने की आंख में बाक़ी

ख़ुदा करे कि जवानी तिरी रहे बे-दाग़

यहाँ एक और गंभीर ग़लतफ़हमी सामने आती है जिसमें बहुत से धार्मिक (दीनी), शैक्षिक और ज्ञानवर्धक यूट्यूब चैनल चलाने वाले मुस्लिम युवा मुब्तिला हैं। आमतौर पर यह मान लिया जाता है कि चूंकि वीडियो की सामग्री क़ुरआन की आयतें, हदीसें, फ़िक़्ही मसले या नसीहतें हैं, इसलिए इस सामग्री से होने वाली पूरी कमाई अपने-आप हलाल और पवित्र हो गई। यह एक ख़तरनाक अज्ञानता है। इनमें से अधिकतर युवाओं को सिर्फ़ वीडियो एडिटिंग और अपलोडिंग से मतलब होता है, लेकिन वे सोशल मीडिया के मोनेटाइज़ेशन मॉडल और ऑटोमेटेड एल्गोरिदम की तकनीकी बनावट से पूरी तरह अनजान होते हैं।

यूट्यूब, फेसबुक और इंस्टाग्राम का एल्गोरिदम हर यूज़र की सर्च हिस्ट्री, कुकीज़ और लोकेशन के आधार पर स्क्रीन पर अपने-आप विज्ञापन (Automated Ads) चलाता है। यानी कोई इंसान बैठकर यह तय नहीं करता कि किस वीडियो पर क्या दिखाना है। इसका परिणाम यह निकलता है कि स्क्रीन पर एक तरफ़ क़ुरआन की तिलावत या कोई दीनी मसला चल रहा होता है, और उसी वीडियो के ऊपर, नीचे या बीच में जुआ, सट्टेबाज़ी वाले ऐप्स, ब्याज़ वाले क़र्ज़, डेटिंग साइट्स या अश्लील मॉडल्स के विज्ञापन दिखने लगते हैं।

याद रखिए, शरीअत का नियम है: “गुनाह के काम में मददगार बनना भी गुनाह है।” अल्लाह तआला का स्पष्ट आदेश है:

“और गुनाह व ज़्यादती के कामों में एक-दूसरे का सहयोग मत करो।” (अल-माइदा: 2)

जब कोई क्रिएटर अपने चैनल पर बिना किसी इस्लामी फ़िल्टर के मोनेटाइज़ेशन ऑन करता है, तो वह सिस्टम को खुली छूट दे देता है कि वह उसकी वीडियो पर हराम चीज़ों का प्रचार करे, और क्रिएटर इन्हीं विज्ञापनों के बदले पैसे लेता है। ऐसी स्थिति में सिर्फ़ वीडियो का विषय दीनी होने से कमाई हलाल नहीं हो जाती, बल्कि वह हराम के प्रचार का मेहनताना बनकर सख़्त गुनाह का कारण बन जाती है। रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया:

“हर वह शरीर जो हराम माल से पला-बढ़ा हो, उसके लिए जहन्नम की आग ही सबसे अधिक उपयुक्त है।” (जामेअ तिरमिज़ी: 614)

हलाल रोज़ी की अहमियत पर अल्लामा इक़बाल का यह शेर याद रखने योग्य है:

ऐ ताइरे लाहूती उस रिज़्क़ से मौत अच्छी

जिस रिज़्क़ से आती हो परवाज़ में कोताही

इसलिए सोशल मीडिया पर दीनी और उपयोगी सामग्री अपलोड करने वालों पर यह फ़र्ज़ बनता है कि वे केवल वीडियो के विषय पर संतुष्ट न हों, बल्कि अपने चैनल के ऐडसेंस और मोनेटाइज़ेशन की सेटिंग्स की लगातार निगरानी करें। वे तमाम अश्लील, ब्याज़, जुए और ग़लत विज्ञापनों को स्थायी रूप से फ़िल्टर और ब्लॉक करें। वर्ना अनजाने में ही सही, बुराई के प्रचार का गुनाह उन्हीं के सिर होगा और सारी मेहनत पर पानी फिर जाएगा।

हलाल कमाई के विकल्प

इस्लाम सूचना और संचार माध्यमों को पूरी तरह ख़ारिज नहीं करता, बल्कि उन्हें नैतिक नियमों का पाबंद बनाता है। सोशल मीडिया और इंटरनेट के ज़रिए हलाल और शरीअत के दायरे में रहकर कमाई करने के कई वैध विकल्प मौजूद हैं:

  1. विज्ञापनों की कड़ी फ़िल्टरिंग (Ad Filtering): अगर वेबसाइट या यूट्यूब पर ऐडसेंस इस्तेमाल करना ज़रूरी हो, तो क्रिएटर को चाहिए कि वह कंट्रोल पैनल में जाकर तमाम संवेदनशील और हराम श्रेणियों (जुआ, ब्याज़, अश्लीलता आदि) को पूरी तरह ब्लॉक कर दे। अगर एल्गोरिदम पर नियंत्रण संभव न हो और अश्लील विज्ञापन रुक न सकें, तो ऐसे ऐड सिस्टम को छोड़ देना ही तक़वा (परहेज़गारी) है।
  2. सीधे स्पॉन्सरशिप (Direct Sponsorships): एल्गोरिदम पर निर्भर रहने के बजाय सिर्फ़ उन्हीं प्रतिष्ठित और हलाल कंपनियों या उत्पादों का प्रचार किया जाए जिनकी स्वयं क्रिएटर ने जांच की हो। इसमें अश्लील दृश्यों का ख़तरा नहीं होता।
  3. फ़्रीलांसिंग (Freelancing): कैमरे के सामने अपनी या घर की नुमाइश किए बिना अपनी तकनीकी योग्यताओं से कमाना। जैसे: वेब डेवलपमेंट, ऐप कोडिंग, ग्राफ़िक डिज़ाइनिंग, एसईओ (SEO), वीडियो एडिटिंग और अनुवाद (Translation)। यहाँ विशुद्ध मेहनत के बदले पारदर्शी और हलाल कमाई होती है।
  4. डिजिटल सामग्री की बिक्री: प्रमाणित शैक्षिक कोर्स, उपयोगी ई-बुक्स, रिसर्च पेपर्स या सॉफ़्टवेयर टूल्स बनाकर इंटरनेट पर बेचना।
  5. निजी व्यापार और ब्रांडिंग: सोशल मीडिया को अपने सामान, किताबें, कपड़े या दस्तकारी के सामान सीधे ग्राहकों तक पहुँचाने का ज़रिया बनाना, जहाँ ईमानदारी और अमानतदारी मुख्य आधार हो।

इसके अलावा भी कई वैध तरीके मौजूद हैं।

निष्कर्ष यह है कि यह लड़ाई केवल व्यूज़, लाइक्स या डॉलर्स की नहीं है, बल्कि यह हया और बेशर्मी, तथा हलाल और हराम के बीच की जंग है। कैमरे का लेंस, क़लम की ताक़त और इंटरनेट की पहुंच अल्लाह की दी हुई अमानत हैं, जिनका मक़सद समाज का नैतिक निर्माण था; न कि अपने घरों के राज़ बेचना, मां-बहनों के सम्मान की नीलामी करना या सस्ती शोहरत के लिए अपनी गैरत गंवाना।

रिज़्क़ (आजीविका) का संबंध स्क्रीन पर चमकते नंबरों से नहीं, बल्कि अल्लाह की बरकत से है। हया बेचकर मिला रिज़्क़ असल में रिज़्क़ नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए तबाही है।

परवाज़ है दोनों की इसी एक फ़ज़ा में

करगस का जहाँ और है, शाहीन  का जहाँ और

करगस: (गिद्ध), शाहीन: (बाज़)

अल्लाह के डर, आत्मसम्मान और पर्दे के साथ कमाया गया हलाल का एक सूखा निवाला भी, हया बेचकर कमाए गए डॉलर्स के ढेरों से हज़ारों गुना बेहतर, शांतिदायक और स्थायी है।

मिरा तरीक़ अमीरी नहीं, फ़क़ीरी है

ख़ुदी न बेच, ग़रीबी में नाम पैदा कर!

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