shabe barat ki fazilat

Shabe Barat Ki Fazilat शबे बरात की फजीलत और हक़ीकत

लेखक: मोहम्मद हाशिम कासमी बस्तवी

शबे बारात की फजीलत हदीसों से साबित है

शबे बारात के बारे में अगर कोई बियक्त यह कहता हो कि: इस रात का कोई महत्व नहीं, इस इसकी कोई फजीलत नहीं तो उस बियक्य की बात को नकार दिया जाएगा, क्यूंकि इस रात की अहमियत और फजीलत में बहुत सारी हदीसें आई हैं, हम आप के सामने कुछ हदीसों को उन के अनुवाद के साथ शियर कर रहे हैं:

عَنْ عَلِيِّ بْنِ أَبِي طَالِبٍ، قَالَ: قَالَ رَسُولُ اللَّهِ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ: “إِذَا كَانَتْ لَيْلَةُ النِّصْفِ مِنْ شَعْبَانَ، فَقُومُوا لَيْلَهَا وَصُومُوا نَهَارَهَا، فَإِنَّ اللَّهَ يَنْزِلُ فِيهَا لِغُرُوبِ الشَّمْسِ إِلَى سَمَاءِ الدُّنْيَا، فَيَقُولُ: أَلَا مِنْ مُسْتَغْفِرٍ لِي فَأَغْفِرَ لَهُ أَلَا مُسْتَرْزِقٌ فَأَرْزُقَهُ أَلَا مُبْتَلًى فَأُعَافِيَهُ أَلَا كَذَا أَلَا كَذَا، حَتَّى يَطْلُعَ الْفَجْرُ”.  رواه ابن ماجه في سننه (1388)، والبيهقي في الفضائل (22).

अनुवाद: हज़रत अली बिन अबी तलिब (रज़ी) से रिवायत है कहते हैं रसूलुल्लाह सल्लललहू अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया कि: शाबान की पंद्रहवीं रात को अल्लाह की इबादत करो, और उस के बाद दिन में रोज़ा रख्खो, बेशक अल्लाह दुनिया के आसमान पर उतरते हैं, और कहते हैं: है कोई मगफिरत तलब करने वाला मै उसकी मगफिरत करूं, और है कोई रोज़ी की दुआ करने वाला मैं उसको रोज़ी दूँ, है कोई बिमारी से शिफा मांगने मैं उसकी बिमारी दूर करूं, और अल्लाह की पुकार का यह सिलसिला सुबह सादिक तक रहता है।[1]

عَنْ عَبْدِ اللهِ بْنِ عَمْرٍو:  أَنَّ رَسُولَ اللهِ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ قَالَ: ” يَطَّلِعُ اللهُ عَزَّ وَجَلَّ إِلَى خَلْقِهِ لَيْلَةَ النِّصْفِ مِنْ شَعْبَانَ فَيَغْفِرُ لِعِبَادِهِ إِلَّا لِاثْنَيْنِ: مُشَاحِنٍ، وَقَاتِلِ نَفْسٍ”. رواه أحمد في مسنده (6642).

अनुवाद: हज़रत अब्दुलाह बिन अम्र (रज़ी) से रिवायत कि: रसूलुल्लाह सल्लललहू अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया कि: अल्लाह पंद्रहवीं शाबान की रात अपनी मखलूक की तरफ तवज्जोह करतें हैं, और अंपने सारे बन्दों को माफ़ कर देते हैं, मगर दो लोगों को माफ़ नहीं करते: एक बैर और कीना रखने वाले को, और दोसरे हत्तायारे को। [2]

عَنْ أَبِي بَكْرٍ الصِّدِّيقِ، رَضِيَ اللَّهُ عَنْهُ، عَنِ النَّبِيِّ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ قَالَ: «يَنْزِلُ اللَّهُ تَبَارَكَ وَتَعَالَى لَيْلَةَ النِّصْفِ مِنْ شَعْبَانَ إِلَى السَّمَاءِ الدُّنْيَا، فَيَغْفِرُ لِكُلِّ نَفْسٍ؛ إِلَّا إِنْسَانٍ فِي قَلْبِهِ شَحْنَاءٌ، أَوْ مُشْرِكٍ بِاللَّهِ عَزَّ وَجَلَّ». رواه ابن أبي الأعصم في السنة (509).

अनुवाद: हज़रत अबू बक्र सिद्दीक (रज़ी) नबी करीम सल्लललहू अलैहि वसल्लम से रिवायत करते हैं आप सल्लललहू अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया कि: अल्लाह ताला पंद्रहवीं शाबान की रात को दुनिया के आकाश पर पर्कट होते हैं, और हर व्यक्ति को क्षमा कर देते हैं, मगर उस व्यक्ति को क्षमा नहीं मिलती जिस जिस के हिर्दय में कीना कपट हो या जो इश्वर के साथ किसी को पूजा साझा करता हो।[3]

عَنْ أَبِي مُوسَى، قَالَ: سَمِعْتُ رَسُولَ اللَّهِ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ يَقُولُ: «يَنْزِلُ رَبُّنَا تَبَارَكَ وَتَعَالَى إِلَى سَمَاءِ الدُّنْيَا لَيْلَةَ النِّصْفِ مِنْ شَعْبَانَ، فَيَغْفِرُ لِأَهْلِ الْأَرْضِ؛ إِلَّا مُشْرِكٍ أَوْ مُشَاحِنٍ». رواه ابن أبي الأعصم في السنة (510).

हज़रत अबू मूसा से जो रिवायत है उस का अनुवाद वही है जो हज़रत अबू बक्र सिद्दीक की रिवायत का है।[4]

इस के इलावा और बहुत सारी रिवायतें हदीस की पुस्तकों में है, उन में से जादा तर रवायतों का मतलब वही है जो उपर की हदीसों में आया है।

ऊपर वर्णित हदीसें अगरचे उन में से अक्सर सनद के अंतर्गत कमज़ोर हैं लेकिन वह सब बहुत से सहाबा से रिवायत की गयी हैं, जो एक दोसरे से मिल कर शबे बारात की फजीलत को साबित करने के लिए काफी हैं, इस लिए शबे बारात की फ़ज़ीलत को एक दम से इंकार करना सही नहीं है।

शबे बारात में इबादत का इहतिमाम

जैसा की आप हदीसों की रौशनी में यह बात जान चुके हैं कि यह रात फ़ज़ीलत वाली है, सहाबा और ताब्यीन से इस रात में इबादत करना साबित है, वह लोग भी इस रात में अल्लाह की इबादत करते थे, तो हमें भी इस रात से फायदा उठाना चाहिए, और उस रात में अल्लाह की इबादत करनी चाहिए ताकि अल्लाह ताला हमें भी माफ़ कर दे।

हाँ इतनी बात ज़रूर है की इस रात में इबादत का कोई ख़ास तरीका हदीसों से साबित नहीं है, जिस का दिल चाहे क़ुरान की तिलावत करे, और जिस का दिल चाहे नफ्लें पढ़े, अगर कोई यह कहे कि इस तरह से नमाज़ पढ़ना या इस तरह से इबादत करने में जादा सवाब है तो वह बात बिल्कुल गलत और बे बुनियाद है।

शबे बारात में कब्रस्तान पर जाना

इस के बारे में जो रिवायत पहले हम उस को बताते हैं उस के बाद उस टिप्पड़ी करें गे:

عَنْ عَائِشَةَ قَالَتْ: فَقَدْتُ رَسُولَ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ لَيْلَةً فَخَرَجْتُ، فَإِذَا هُوَ بِالبَقِيعِ، فَقَالَ: «أَكُنْتِ تَخَافِينَ أَنْ يَحِيفَ اللَّهُ عَلَيْكِ وَرَسُولُهُ»، قُلْتُ: يَا رَسُولَ اللَّهِ، إِنِّي ظَنَنْتُ أَنَّكَ أَتَيْتَ بَعْضَ نِسَائِكَ، فَقَالَ: «إِنَّ اللَّهَ عَزَّ وَجَلَّ يَنْزِلُ لَيْلَةَ النِّصْفِ مِنْ شَعْبَانَ إِلَى السَّمَاءِ الدُّنْيَا، فَيَغْفِرُ لِأَكْثَرَ مِنْ عَدَدِ شَعْرِ غَنَمِ كَلْبٍ». رواه الترمذي في سننه (739).

अनुवाद: हज़रत आईशा (रज़ी) से रिवायत है कि एक बार का किस्सा है कि मैं ने एक रात आप सल्लललहू अलिही वसल्लम को बिस्तर पर नहीं पाया, मैं आप की तलाश में निकल पड़ीं, उस वक़्त आप जन्नतुल बक़ीअ में तशरीफ़ फरमा थे, मुझे देख कर आप ने फ़रमाया: क्या तुम्हे इस बात का डर है की तुम पर अल्लाह और उस के रसूल ज़ुल्म करें गे मैं ने कहा: नहीं ऐ अल्लाह के रसूल, मुझे ऐसा लगा कि आप मुझे छोड़ कर अपनी दोसरी पत्नीयों के पास चले गए हैं, उस के बाद आप ने फ़रमाया कि: अल्लाह ताला पंद्रहवीं शाबान की रात को दुनिया के आकाश पर पर्कट होते हैं, और बकरी के हर हर बाल से जादा लोगों की मगफिरत करते हैं।[5]

जैसा कि हदीस से मालूम होता है की पंद्रहवीं शाबान की रात को आप सल्लललहू अलिही वसल्लम  जन्नतुल बकी में गए थे, तो इस हदीस की वजह से बहुत सरे मुस्लमान इस रात को कब्रस्तान पर जाने का इह्तिमम करने लगे, लेकिन उन को यह बात मालूम होनी चाहिए कि आप सल्लललहू अलैहि वसल्लम अपनी पूरी ज़िन्दगी में सिर्फ एक ही बार शबे बारात की रात में कब्रस्तान गए थे, इस लिए एक दो बार जाने में कोई मसला नहीं है, लेकिन हर शबे बारात को कब्रस्तान जाना, और जाने को ज़रूरी समझना, और कब्रस्तान जाने को शबे बारात का एक ज़रूरी हिस्सा समझना यह बात हदीस के उपर है, ऐसा करना मुनासिब नहीं है।

पंद्रहवीं शाबान का रोज़ा

सिर्फ पंद्रहवीं शाबान के रोज़े के बारे में हदीस की पुस्तकों में सिर्फ एक रिवायत हज़रत अली से आई है जिस को हम उपर बता चुके हैं जिस में यह बात आई हैं कि पंद्रहवीं शाबान को रोज़ा रख्खो, लेकिन यह रिवायत ज़ईफ़ है सनद के हिसाब से सही नहीं है, इस लिए इस रिवायत को बुनियाद बना कर पंद्रहवीं शाबान के रोज़े को सुन्नत यह मुस्तहब बताना कुछ उलमा के नज़दीक सही नहीं है, और रही इस रात में इबादत की बात तो इस के बारे में बहुत सी हदीसें हैं जिन में से कुछ रिवायतों को लिख चुके हैं, जिन से मालूम होता है की इस रात में जागना और इबादत करना सवाब का काम है।

इस लिए बगैर सुन्नत या मुस्तहब समझ कर अगर कोई रोज़ा रख ले तो कोई मसला नहीं है,वैसे 28, और 29 शाबान को छोड़ कर पुरे शाबान के महीने का रोज़ा रखना सुन्नत है, हदीसों में उस की बड़ी फज़ीलत आई है।


फुटनोट

[1] सुनन इब्ने माजह: हदीस नम्बर 1388, फज़येल औकात इमाम बैहकी हदीस नम्बर: 22

[2] मुसनदे अहमद हदीस नम्बर: 6642

[3] अल सुन्नह इमाम इब्ने अबी आसाम: हदीस नम्बर: 509

[4] अल सुन्नह इमाम इब्ने अबी आसाम: हदीस नम्बर: 510

[5] सुनने तिरमिज़ी हदीस नंबर: 739

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